Thursday, March 21, 2019

新西兰“天堂”梦醒?悲剧过后反思“移民乐园”

刚发生在新西兰的枪击事件震惊全球,理由不仅是白人枪手在两所清真寺滥杀无辜,50人丧命,更因为发生地是在宁静得似乎与世无争的新西兰。

新西兰总理杰辛达·阿德恩(Jacinda Ardern)周四(3月21日)召开记者会,宣布新西兰将出台一系列枪枝管控法案,禁止大众拥有军事性用途的半自动枪枝(Military Style Semi-Automatics ) 及突击步枪(assault rifles)。

新西兰政府估计该国有150万枪枝流通,有执照的武器只有24万支。

这次针对少数族裔的暴力,也让人们重新审视新西兰内部的种族问题,“移民天堂”面临重新洗牌。

人以群分?新西兰的我们与他们
攻击事件发生当日,阿德恩迅速在媒体上发表评论指称凶嫌为“恐怖攻击”,除了哀悼之外,表示“我们”亦即新西兰,不会被“你们”也就是种族主义者击垮,“我们”新西兰会继续走包容的路。

然而,新西兰威灵顿维多利亚大学人类学系教授凯瑟琳·川朵尔(Catherine Trundle)批评称,阿德恩的表态忽略了新西兰的种族歧视,“这名澳大利亚白人主嫌也是从‘我们’的社会中变成了种族主义恐怖分子”。

川朵尔指出,种族主义者以及暴行早就存在于新西兰。比如,信奉“白人至上”的政党在此次悲剧发生的基督城(Christchurch)选举中也拿过2%的选票,另外大大小小的种族攻击事件也时有发生。

她认为,需要考量的不是将恐怖攻击者定义为“非我族类”,而是新西兰社会为何没有从来没有严肃地处理近年来兴起的种族主义极端份子。在社会氛围解放的新西兰社会,那些种族主义者的言论多半被视为笑话,众人不屑一顾。

研究新西兰移民与社会网络的新西兰国家人口与经济分析中心(NIDEA)主任法兰西斯柯林斯(Francis Collins)教授告诉BBC中文,新西兰历史上是个殖民国家,当地原住民毛利人(Māori)两百年来受英国与白人殖民统治,这个殖民历史的伤口,新西兰社会尚未处理完善,接着许多社会歧视,包含就业、文化以及教育上还是时有耳闻

柯林斯教授解释,新西兰在西方,特别是英国海外殖民历史上,一直被包装成“天堂”以及安全的“海角乐园”形象。到了近代,则是被以宜居,绿色安全等市场论述包装,吸引移民。

然而,柯林斯对BBC中文表示,此次攻击说明,这些针对少数族群歧视甚或攻击的恶行,一直也存在于有“天堂乐园”之称的新西兰。

此次种族攻击事件,也引起当地华人紧张。根据官方统计,目前新西兰约有20万华人。自小移民奥克兰(Auckland)20年的台湾移民张小姐告诉BBC中文,此次事件发生,让她与家人十分震惊。

据分析,新西兰政府与社会在1990年代对于华人移民十分排斥,甚或歧视。当时的执政党一直对华人移民十分不友善,社会上也批评移民抢走新西兰人工作机会。

2003年之后,新西兰开始重新检讨,并将自己打造为开放以及自由的国家,移民条件改善。

新西兰现在是唯一开放30岁以下中国公民申请旅游打工签证(Working Holiday Visa)的国家,每年约有1000位中国公民申请此签证。

根据2013年的官方统计,华人虽然平均教育程度高于新西兰白人,但收入却低于后者。

张小姐告诉BBC中文,移民一开始对于新西兰确实会有一些美好的想像,包括良好教育、优美的自然环境及友善的人民。但在接触到种族歧视后带来许多情感幻灭。张小姐强调,新西兰还是多元文化的表率,多数国民对待移民十分友善,只是偶尔会遇到一些种族歧视。

柯林斯称,华人移民还是面对许多就业以及教育领域中的歧视。他强调,此次悲剧敲响了新西兰面对种族主义的警钟。他说,新西兰总体处理此次50人无辜丧命的悲剧十分恰当,然而,把新西兰描绘成移民天堂确实是个虚构。

2017年,奥克兰华人与印度团体便联合上街游行,抗议针对少数族裔的抢劫攻击案件日渐严重。

居住在奥克兰的台湾移民艾瑞克告诉BBC中文说,此次悲剧证明新西兰与其他国家在种族主义阴影下一样脆弱。但他不认为此次单一事件证明了新西兰种族主义情形严重,他认为这是媒体过度反应。此次事件让新西兰人不分你我,关心彼此。

Thursday, March 7, 2019

कभी इधर-कभी उधर, ये हैं भारतीय राजनीति के 9 सबसे बड़े अवसरवादी दल!

देश में करीब 35 ऐसी पार्टियां हैं जो लोकसभा चुनावों से पहले गठबंधनों में शामिल होती हैं. या तो ये पार्टियां बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए में या फिर कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन से चुनाव पूर्व सीटों पर तोलमोल तो करती हैं, लेकिन आमतौर पर हर चुनाव में एक गठबंधन या उसके आसपास वाली पार्टियों से समझौता करते हैं. लेकिन इन 35 पार्टियों में 9 ऐसी हैं जो दो धुर-विरोधी गठबंधनों के बीच बेरोकटोक चुनाव पूर्व समझौता करती हैं.

चार लोकसभा चुनावों गठबंधन से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु की चार प्रमुख राजनीतिक पार्टियां पहले पायदान पर हैं. यह खिताब इसलिए है कि ये पार्टियां लगभग सभी गठबंधन, यूपीए और एनडीए के अलावा तीसरे मोर्चे तक से सीटों का समझौता कर चुकी हैं. समझौते के बाद अगर चुनावी नतीजे ठीक नहीं आए तो अगले चुनाव में ये पार्टियां दूसरे गठबंधन का हिस्सा बन जाती हैं.

1999 में डीएमके, एमडीएमके और पीएमके ने बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ मिलकर तमिलनाडु की 31 सीटों पर चुनाव लड़ा और 21 पर जीत हासिल की. जबकि चौथी बड़ी पार्टी एआईएडीएमके कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए के साथ चुनाव लड़ी और 10 सीट जीत पाई.

एआएईडीएमके

लेकिन अगले लोकसभा चुनावों में (2004) में इन सभी पार्टियों ने पलटी मार ली. डीएमके, एमडीएमके और पीएमके यूपीए के साथ तो एआईएडीएमके बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए का दामन थाम लिया. हालांकि यूपीए वाली पार्टियों को तो फायदा हुआ, लेकिन एआईएडीएमके का दांव उलटा पड़ा तमिलनाडु की लोकसभा सीट में कोई खाता तक नहीं खोल पाई.

जबकि इसी चुनाव में यूपीए के साथ आने पर डीएमके ने 16 सीट, पीएमके ने 5 सीट और एमडीएमके ने 4 लोकसभा सीट जीत लिया.

2004 में खाता नहीं खुलने के बाद एआएईडीएमके ने 2009 में नए गठबंधन तीसरे मोर्चे से हाथ मिला लिया और 9 सीट जीत गई. लेकिन 2014 में एआईएडीएमके अकेले चुनाव लड़ी और तमिलनाडु की 39 में से 37 सीटों पर रिकॉर्ड जीत हासिल की. एनडीए के साथ जुड़ने वाली बाकी तमिल पार्टियां मोदी हवा के बावजूद भी दो सीट पर सिमट गई. 2014 में पीएमके और बीजेपी को मात्र एक-एक सीट मिल पाई. अब एआईएडीएमके ने यूपीए, एनडीए, थर्ड फ्रंट से होते हुए 2019 में फिर से एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ने जा रही है.

पिछड़ी जातियों के भीतर वोटबैंक में दखल रखने वाली पार्टी के वोट शेयर से लेकर सीट तक लगातार घटती रही. 2009 में  तो पीएमके जीरो पर सिमट गई. उस वक्त पीएमके ने थर्ड फ्रंट के साथ चुनाव लड़ा था.

डीएमके

गठबंधन की राजनीति की शुरुआत 1999 से मानी जाती है. इस शुरुआती दौर में तमिलनाडु की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी डीएमके ने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा, लेकिन ठीक अगले चुनाव यानी 2004 में कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन यूपीए में शामिल हुई और 16 सीट पर जीत हासिल की. लगातार सीट में फायदा देखते हुए डीएमके ने 2009 का चुनाव भी यूपीए के साथ लड़ा और 18 सीट पर जीत हासिल की. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में डीएमके ने एआईएडीएमके के तर्ज पर अकेले चुनाव लड़ा और खाता तक नहीं खोल पाई. हालांकि डीएमके 27 सीटों पर दूसरे नंबर की पार्टी थी.

तमिलनाडु की राजनीति में चौथा बड़ा दल एमडीएमके की भी राजनीति पीएमके की तरह गठबंधनों के बीच झूलती रही है. 1999 मे एनडीए, 2004 में यूपीए और 2009 में तीसरा मोर्चा और 2014 में फिर एनडीए के साथ चुनाव लड़ी. 2014 में मोदी की हवा थी बावजूद उसके एमडीएमके तमिलनाडु में खाता तक नहीं खोल पाई.

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस ने 1999 और 2004 का चुनाव एनडीए के साथ मिलकर लड़ा. पहली बार 8 सीट मिली, लेकिन दूसरी बार केवल दो सीट. ममता ने तीसरे चुनाव यानी 2009 में यूपीए से हाथ मिलाया और 19 सीटों पर जीत हासिल कर ली. उसके बाद 2014 में तृणमूल किसी भी गठबंधन के साथ नहीं गई. लेकिन पार्टी 2019 के चुनावों के लिए एक बार फिर गठबंधन का हिस्सा बनने जा रही है. मौजूदा संकेतों के मुताबतिक ममता बनर्जी 2019 का चुनाव महागठबंधन के नाम पर लड़ सकती हैं.